Uljhan
मुख़्तसर है कहानी क्या अब सुनाऊँ,
पेच-ओ-ख़म कैसे कैसे ,मैं कैसे बताऊँ,
एक गोशा है जो कहीं पे जम सा गया है,
एक उनलझन से निकलूं तो दूजी सुलझाऊँ,
ग़म-ओ-सोग ही हैं मरासिम के ज़ेवर,
रक्कासा ज़िन्दगी को सरापा सजाऊँ,
ना जाने वो क्या है मैं हूँ जिस से नालां,
जो दिखता ही नहीं है वो कैसे छुपाऊँ
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