Firaq 1

 दौर-ए-बातिल है कि कटता ही नहीं, 

धुआं तेरी फ़िराक का छंटता ही नहीं,


एक छोटे से जहन के हुए हैं हिस्से कितने,

शीशा-ए-रब्त है कि टूटकर बंटता ही नहीं।  

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