मुख़्तसर है कहानी क्या अब सुनाऊँ, पेच-ओ-ख़म कैसे कैसे ,मैं कैसे बताऊँ, एक गोशा है जो कहीं पे जम सा गया है, एक उनलझन से निकलूं तो दूजी सुलझाऊँ, ग़म-ओ-सोग ही हैं मरासिम के ज़ेवर, रक्कासा ज़िन्दगी को सरापा सजाऊँ, ना जाने वो क्या है मैं हूँ जिस से नालां, जो दिखता ही नहीं है वो कैसे छुपाऊँ
फुर्सत में तकल्लुफ से जिया जा रहा है, तेरा इंतज़ार अब भी किया जा रहा है, भूल जाने को बस एक छोटा सा किस्सा, एक हादसा तख़लीक़ दिया जा रहा है, फीकी हो चली है जब से मेरी रंगत, तेरा एक नाम हरसू लिया जा रहा है, पहले ही थी कुछ नीम सी तबियत, उसपे ज़हर अब पीया जा रहा है, तेरा एक नाम हरसू लिया जा रहा है, तेरा इंतज़ार अब भी किया जा रहा है
ये तेरी ज़मीं है, यहाँ ग़म क्यूँ हैं, सिलसिले रब्त के यहां कम क्यूँ हैं, अब के भी हम शिकस्ता ही हैं , हम पे अपनों के इतने करम क्यूँ हैं, तेरी खल्क में दिखते हैं नाफ़िज़ साये, मेरे यकीं को मय्यसर ये भरम क्यूँ है, फ़लसफ़ा बन गुज़रा ये सवाल उसका, जो ज़ख्म है तो फिर ये मरहम क्यूँ है, पल में गुज़री हैं उम्र-ए-खुशां जैसे, गुज़रती नहीं एक शब्-ए-ग़म क्यूँ है
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