मुख़्तसर है कहानी क्या अब सुनाऊँ, पेच-ओ-ख़म कैसे कैसे ,मैं कैसे बताऊँ, एक गोशा है जो कहीं पे जम सा गया है, एक उनलझन से निकलूं तो दूजी सुलझाऊँ, ग़म-ओ-सोग ही हैं मरासिम के ज़ेवर, रक्कासा ज़िन्दगी को सरापा सजाऊँ, ना जाने वो क्या है मैं हूँ जिस से नालां, जो दिखता ही नहीं है वो कैसे छुपाऊँ
फुर्सत में तकल्लुफ से जिया जा रहा है, तेरा इंतज़ार अब भी किया जा रहा है, भूल जाने को बस एक छोटा सा किस्सा, एक हादसा तख़लीक़ दिया जा रहा है, फीकी हो चली है जब से मेरी रंगत, तेरा एक नाम हरसू लिया जा रहा है, पहले ही थी कुछ नीम सी तबियत, उसपे ज़हर अब पीया जा रहा है, तेरा एक नाम हरसू लिया जा रहा है, तेरा इंतज़ार अब भी किया जा रहा है
अपनी दानिस्त मैं छुपाऊं तो बेहतर, यूँहीं ज़माने से रूठ जाऊं तो बेहतर, रक्स नादानी का करूँ कूचा कूचा, जो मैं भी तुमसा बन पाऊं तो बेहतर, बेहद छोटी सी है तेरी उम्मीद मुझ से, बहरहाल खुदा कहलाऊँ तो बेहतर, संगसार करूँ मुसलसल खुद को, फिर हँस के सर झुकाऊं तो बेहतर', बाद-ए-सबा में जलती शमा है ज़िन्दगी, कुछ देर और इसे जलाऊं तो बेहतर |
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