Baharhaal

 अपनी दानिस्त मैं छुपाऊं तो बेहतर,

यूँहीं ज़माने से रूठ जाऊं तो बेहतर,


रक्स नादानी का करूँ कूचा कूचा, 

जो मैं भी तुमसा बन पाऊं तो बेहतर,


बेहद छोटी सी है तेरी उम्मीद मुझ से,

बहरहाल खुदा कहलाऊँ तो बेहतर,


संगसार करूँ मुसलसल खुद को,

फिर हँस के सर झुकाऊं तो बेहतर',


बाद-ए-सबा में जलती शमा है ज़िन्दगी,

कुछ देर और इसे जलाऊं तो बेहतर | 

  


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