Talkhi

 रवायत की ओर खींचे जा रहे हैं, 

हम अब सफहों नीचे जा रहें हैं,

 

यहाँ कौन करता है अक़्क़ासी सच की,

खून से सब्ज़ बाग़ सींचे जा रहे हैं,


उम्मीद है किसको मगर मआशरे से,

है जिनसे वो आँखे मींचे जा रहे हैं,


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