Posts

Showing posts from January, 2022

Firaq 1

 दौर-ए-बातिल है कि कटता ही नहीं,  धुआं तेरी फ़िराक का छंटता ही नहीं, एक छोटे से जहन के हुए हैं हिस्से कितने, शीशा-ए-रब्त है कि टूटकर बंटता ही नहीं।  

Uljhan

 मुख़्तसर है कहानी क्या अब सुनाऊँ, पेच-ओ-ख़म कैसे कैसे ,मैं कैसे बताऊँ, एक गोशा है जो कहीं पे जम सा गया है, एक उनलझन से निकलूं तो दूजी सुलझाऊँ, ग़म-ओ-सोग ही हैं मरासिम के ज़ेवर, रक्कासा ज़िन्दगी को सरापा सजाऊँ, ना जाने वो क्या है मैं हूँ जिस से नालां, जो दिखता ही नहीं है वो कैसे छुपाऊँ

Talkhi

 रवायत की ओर खींचे जा रहे हैं,  हम अब सफहों नीचे जा रहें हैं,   यहाँ कौन करता है अक़्क़ासी सच की, खून से सब्ज़ बाग़ सींचे जा रहे हैं, उम्मीद है किसको मगर मआशरे से, है जिनसे वो आँखे मींचे जा रहे हैं,

Umeed

 फुर्सत में तकल्लुफ से जिया जा रहा है,  तेरा इंतज़ार अब भी किया जा रहा है, भूल जाने को बस एक छोटा सा किस्सा,  एक हादसा तख़लीक़ दिया जा रहा है,  फीकी हो चली है जब से मेरी रंगत, तेरा एक नाम हरसू लिया जा रहा है, पहले ही थी कुछ नीम सी तबियत,  उसपे ज़हर अब पीया जा रहा है, तेरा एक नाम हरसू लिया जा रहा है,  तेरा इंतज़ार अब भी किया जा रहा है     

Sawaal

 ये तेरी ज़मीं है, यहाँ ग़म क्यूँ हैं, सिलसिले रब्त के यहां कम क्यूँ हैं,   अब के भी हम शिकस्ता ही हैं , हम पे अपनों के इतने करम क्यूँ हैं, तेरी खल्क में दिखते हैं नाफ़िज़ साये, मेरे यकीं को मय्यसर ये भरम क्यूँ है, फ़लसफ़ा बन गुज़रा ये सवाल उसका, जो ज़ख्म है तो फिर ये मरहम क्यूँ है, पल में गुज़री हैं उम्र-ए-खुशां जैसे, गुज़रती नहीं एक शब्-ए-ग़म क्यूँ है

Baharhaal

 अपनी दानिस्त मैं छुपाऊं तो बेहतर, यूँहीं ज़माने से रूठ जाऊं तो बेहतर, रक्स नादानी का करूँ कूचा कूचा,  जो मैं भी तुमसा बन पाऊं तो बेहतर, बेहद छोटी सी है तेरी उम्मीद मुझ से, बहरहाल खुदा कहलाऊँ तो बेहतर, संगसार करूँ मुसलसल खुद को, फिर हँस के सर झुकाऊं तो बेहतर', बाद-ए-सबा में जलती शमा है ज़िन्दगी, कुछ देर और इसे जलाऊं तो बेहतर |