इल्म दरिया और अक्ल समंदर हो जाये
बाखुदा ऐसा कुछ मंज़र हो जाये ,
इल्म दरिया और अक्ल समंदर हो जाये .
हस्ती ऐसी जिसे कोई नज़रअंदाज़ न करे ,
आगे जिसके तख़्त-ओ -ताज भी आवाज़ न करे ,
हो चले गर्म जब मसलों -स्ववालों की हवा ,
मिज़ाज़ ऐसा हो कि जवाब बवंडर हो जाये .
एक तरफ ुकफ , एक तरफ साहिल हो बस ,
टकराये फ़क़त वही जो जाहिल हो बस ,
एक अदब में है कायनात का हिस्सा जो ,
वो चाहे तो पूरा जहाँ उसके अंदर हो जाये .
बाखुदा ऐसा कुछ मंज़र हो जाये ,
इल्म दरिया और अक्ल समंदर हो जाये .
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