ये तेरी ज़मीं है, यहाँ ग़म क्यूँ हैं, सिलसिले रब्त के यहां कम क्यूँ हैं, अब के भी हम शिकस्ता ही हैं , हम पे अपनों के इतने करम क्यूँ हैं, तेरी खल्क में दिखते हैं नाफ़िज़ साये, मेरे यकीं को मय्यसर ये भरम क्यूँ है, फ़लसफ़ा बन गुज़रा ये सवाल उसका, जो ज़ख्म है तो फिर ये मरहम क्यूँ है, पल में गुज़री हैं उम्र-ए-खुशां जैसे, गुज़रती नहीं एक शब्-ए-ग़म क्यूँ है