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Showing posts from February, 2010

आ बैठें दो पल और

आ बैठें दो पल और , कि कोई बात न रह जाये, चंद लम्हों में बसर हो जाती है ये ज़िन्दगी, जाया न करें इक पल भी, कि अधूरी कोई मुलाकात न रह जाये, क्या पता फिर ऐसी शाम आये न आये , कौन जाने ये दो पल कि बहार कब चली जाये, हरियाले अपने आँचल को अभी, कि फिर सूखे पात न रह जाये, आ बैठें दो पल और, कि कोई बात न रह जाये.........

आय

वो सर्द सा मौसम और एक प्याला गर्म चाय, कुछ दोस्तों का मिलना ,यही तो थी जीवन की आय , वो चूल्हा ,वो भट्टी, वो गर्म सी पट्टी , वो ठंडी सी बेंच और हाथों में खारी, कांपते होंठ और चाय की इंतजारी, तभी वो छोटू चाय ले आये , यही तो थी जीवन की आय; दुकान के पीछे , छप्पर के नीचे ,तेल की कढ़ाई में पानी छींटे, खैनी चबाता , वो बीडी सुलगाता, भारी भीड़ में हर पीढ़ी से बतियाता, काला सा तेल और तेज़ मसाला, बेसन से सने हाथ वो उम्रदराज़ रसाला, खाता उधारी पे कोई पकोड़े ले आये , यही तो थी जीवन की आय ; दोस्तों की किताब में दखलंदाजी के हिस्से , कौन भूला है वो बहसबाजी के किस्से, कल कल वो शोर से , चारों ओर सराबोर से, परीक्षा की तारीख से , मुखातिब खौफ के दौर से , सिलेबस से , किताब से , परीक्षा के  हिसाब से, किसी जंग के आगाज़ से ,फिर एक चाय, यही तो थी जीवन की आय..........

कट गया ये दौर भी

कट गया ये दौर भी, कि शाम हो गयी, बढती ही गयी मुद्दतें , उम्र तमाम हो गयी; डूबे रहे हमेशा अपनी ही शह में, और उबरे तो खुदगर्जी निजाम हो गयी; हर चोट से मिलना हुआ कुछ इस तरह, गम हुआ हमराह, बदनसीबी मकाम हो गयी; इस सफ़र में खुद से मिलने का वक़्त न मिला, अब साया भी हुआ गैर , हस्ती गुमनाम हो गयी; बढती ही गयी मुद्दतें , उम्र तमाम हो गयी.............