वो सर्द सा मौसम और एक प्याला गर्म चाय, कुछ दोस्तों का मिलना ,यही तो थी जीवन की आय , वो चूल्हा ,वो भट्टी, वो गर्म सी पट्टी , वो ठंडी सी बेंच और हाथों में खारी, कांपते होंठ और चाय की इंतजारी, तभी वो छोटू चाय ले आये , यही तो थी जीवन की आय; दुकान के पीछे , छप्पर के नीचे ,तेल की कढ़ाई में पानी छींटे, खैनी चबाता , वो बीडी सुलगाता, भारी भीड़ में हर पीढ़ी से बतियाता, काला सा तेल और तेज़ मसाला, बेसन से सने हाथ वो उम्रदराज़ रसाला, खाता उधारी पे कोई पकोड़े ले आये , यही तो थी जीवन की आय ; दोस्तों की किताब में दखलंदाजी के हिस्से , कौन भूला है वो बहसबाजी के किस्से, कल कल वो शोर से , चारों ओर सराबोर से, परीक्षा की तारीख से , मुखातिब खौफ के दौर से , सिलेबस से , किताब से , परीक्षा के हिसाब से, किसी जंग के आगाज़ से ,फिर एक चाय, यही तो थी जीवन की आय..........