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Shikasta

 जीत ही जाऊं मआशरे से तो क्या, अपनों ही से मगर शिकस्ता हूँ मैं, हाल का जैसे कुछ होश ही नहीं, कू-ए-माज़ी में जैसे पैबस्ता हूँ मैं,